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टूट गई 'जय-वीरू' की दोस्ती, क्या अखिलेश से पूछेंगे राहुल-क्या हुआ तेरा वादा?

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सपा-बसपा गठबंधन के बाद उत्तर प्रदेश में सियासी माहौल गर्म हो गया है। भाजपानीत एनडीए के विरोध में एकजुट हो रहे कांग्रेसनीत विपक्ष को बड़ा झटका लगा है। मायावती-अखिलेश ने गठबंधन का एलान कर महागठबंधन की एकजुटता की हवा निकाल दी। यूपी में बीते विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव और राहुल गांधी के साथ आने से नए सियासी समीकरण बने थे। जोड़ी ऐसी फेमस हुई कि दोनों को शोले का जय-वीरू कहा जाने लगा था। शनिवार को यह जोड़ी टूट गई। 

दोनों ने कभी भाजपा के विरोध में साथ रहने की कसमें खाई थीं, जो कि चुनावी ही साबित हुई। ऐसे में राजनीतिक टिप्पणीकार भी यही सवाल उठा रहे हैं कि क्या राहुल गांधी अखिलेश से कांग्रेस का साथ छोड़ने का कारण पूछेंगे। राहुल क्या महागठबंधन से अलग होकर सपा की धुर विरोधी पार्टी बसपा से जुड़ने का कारण पूछेंगे? हां, कांग्रेस ने अलग रणनीति बनाने के संकेत देने शुरू कर दिए हैं। सूत्र बता रहे हैं कि कांग्रेस अपने दम पर चुनाव लड़ सकती है।

कभी जय-वीरू में यूपी का भविष्य दिखाने की हुई थी कोशिश

उत्तर प्रदेश में हर पांच साल पर समीकरण बदलते रहे। कभी अकेले अपने दम पर लड़ती रही सपा को बीते विधानसभा चुनाव में साइकिल को हाथ का साथ क्या मिला, नारे भी बदल गए। प्रदेश के युवाओं को रिझाने के लिए राहुल-अखिलेश में यूपी के युवाओं को भविष्य दिखाने की कोशिश हुई। नया नारा सामने आया- ‘यूपी को ये साथ पसंद है’। दोनों के साथ पर एक और नारा बहुत मशहूर हुआ- ‘अखिलेश नहीं ये आंधी है, साथ में राहुल गांधी है’।

नरेंद्र मोदी द्वारा भाजपा के लिए प्रचार अभियानों में आक्रामकता देखते हुए लोगों को स्थानीयता से जोड़ा गया। एक बार फिर जय-वीरू की इस जोड़ी को उत्तर प्रदेश का बेटा बताते हुए नारा दिया गया था, ‘अपने लड़के, बाहरी मोदी’।लेकिन अब ये नारे अतीत बन गए हैं। दोनों की जोड़ी ज्यादा लंबी नहीं चल सकी। हां, अखिलेश ने इतना लिहाज जरूर किया है कि अमेठी और रायबरेली की सीट पर गठबंधन ने कोई उम्मीदवार नहीं उतारने का फैसला किया है। यहां से राहुल और सोनिया गांधी चुनाव लड़ते हैं। 

 

पिछले साल यूपी विधानसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस गठबंधन ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा, लेकिन भाजपा के खिलाफ मोर्चा में सफल नहीं हो पाए। राहुल और अखिलेश चुनाव से पहले कई मंचों पर साथ-साथ दिखते थे। गठबंधन की मजबूती दिखाने के लिए दोनों एक-दूसरे की तारीफ करते नहीं थकते थे। सार्वजनिक तौर पर कई मंचों पर दोनों की गलबहियां करती तस्वीरें दिखती थीं। 

सोशल मीडिया पर इन तस्वीरों के साथ दोनों के वीडियो भी वायरल होते रहे थे। उस दौरान कई मंचों पर अखिलेश राहुल गांधी की मां और यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी के भी नजदीक दिखते रहते थे। इस दौरान कई तस्वीरें भी सामने आती रहीं।

कांग्रेस के खिलाफ मायावती बोलती रही, अखिलेश सिर हिलाते रहे

अखिलेश सिंह और राहुल गांधी की जय-वीरू वाली दोस्ती क्या टूटी, दरारें साफ नजर आने लगीं। बसपा सुप्रीमो मायावती ने भाजपा शासन को अघोषित आपातकाल बताने के साथ-साथ कांग्रेस के समय को घोषित आपातकाल बताया। कांग्रेस के खिलाफ मायावती शनिवार को प्रेस कांफ्रेंस में आक्रामक रहीं और अखिलेश भी अपनी दोस्ती भूल सिर हिलाते रहे। 

कांग्रेस के साथ मिलकर पिछले विधानसभा चुनाव में बसपा पर हमला बोलते रहने वाले अखिलेश के ही बोल हैं कि आज से मायावती का अपमान मेरा अपमान होगा। उन्होंने फिर वही दोहराया जो राहुल गांधी के साथ गठबंधन बनाकर दोहराया था कि यह गठबंधन स्थाई रहेगा। अब, जबकि दो साल से भी कम समय में राहुल से उनकी दोस्ती टूट चुकी है, तो इस दावे का भविष्य भी सवालों के घेरे में है।  

खास बातें

  • लोकसभा चुनाव के लिए हुआ सपा-बसपा गठबंधन का एलान
  • कांग्रेस से ‘हाथ’ खींच साइकिल अब ‘हाथी’ की सवारी को तैयार
  • बीते विधानसभा चुनाव से पहले हुई थी राहुल-अखिलेश की दोस्ती 
  • विधानसभा चुनाव में कमाल नहीं कर सकी थी जय-वीरू की जोड़ी

सपा-बसपा गठबंधन के बाद उत्तर प्रदेश में सियासी माहौल गर्म हो गया है। भाजपानीत एनडीए के विरोध में एकजुट हो रहे कांग्रेसनीत विपक्ष को बड़ा झटका लगा है। मायावती-अखिलेश ने गठबंधन का एलान कर महागठबंधन की एकजुटता की हवा निकाल दी। यूपी में बीते विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव और राहुल गांधी के साथ आने से नए सियासी समीकरण बने थे। जोड़ी ऐसी फेमस हुई कि दोनों को शोले का जय-वीरू कहा जाने लगा था। शनिवार को यह जोड़ी टूट गई। 

दोनों ने कभी भाजपा के विरोध में साथ रहने की कसमें खाई थीं, जो कि चुनावी ही साबित हुई। ऐसे में राजनीतिक टिप्पणीकार भी यही सवाल उठा रहे हैं कि क्या राहुल गांधी अखिलेश से कांग्रेस का साथ छोड़ने का कारण पूछेंगे। राहुल क्या महागठबंधन से अलग होकर सपा की धुर विरोधी पार्टी बसपा से जुड़ने का कारण पूछेंगे? हां, कांग्रेस ने अलग रणनीति बनाने के संकेत देने शुरू कर दिए हैं। सूत्र बता रहे हैं कि कांग्रेस अपने दम पर चुनाव लड़ सकती है।

कभी जय-वीरू में यूपी का भविष्य दिखाने की हुई थी कोशिश

उत्तर प्रदेश में हर पांच साल पर समीकरण बदलते रहे। कभी अकेले अपने दम पर लड़ती रही सपा को बीते विधानसभा चुनाव में साइकिल को हाथ का साथ क्या मिला, नारे भी बदल गए। प्रदेश के युवाओं को रिझाने के लिए राहुल-अखिलेश में यूपी के युवाओं को भविष्य दिखाने की कोशिश हुई। नया नारा सामने आया- ‘यूपी को ये साथ पसंद है’। दोनों के साथ पर एक और नारा बहुत मशहूर हुआ- ‘अखिलेश नहीं ये आंधी है, साथ में राहुल गांधी है’।

नरेंद्र मोदी द्वारा भाजपा के लिए प्रचार अभियानों में आक्रामकता देखते हुए लोगों को स्थानीयता से जोड़ा गया। एक बार फिर जय-वीरू की इस जोड़ी को उत्तर प्रदेश का बेटा बताते हुए नारा दिया गया था, ‘अपने लड़के, बाहरी मोदी’।लेकिन अब ये नारे अतीत बन गए हैं। दोनों की जोड़ी ज्यादा लंबी नहीं चल सकी। हां, अखिलेश ने इतना लिहाज जरूर किया है कि अमेठी और रायबरेली की सीट पर गठबंधन ने कोई उम्मीदवार नहीं उतारने का फैसला किया है। यहां से राहुल और सोनिया गांधी चुनाव लड़ते हैं। 

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राहुल-अखिलेश की गलबहियां वाली तस्वीरें