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लोकप्रहरी से आगे बढ़कर शब्द साधकों का सम्मान ‘अमर उजाला’ की अनूठी पहल : प्रणब

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न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Fri, 01 Feb 2019 12:57 AM IST

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पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने शब्द सम्मान अलंकरण समारोह में कहा कि ‘अमर उजाला’ ने लोक प्रहरी की भूमिका से आगे बढ़कर शब्द साधकों का सम्मान किया है। यह अनूठी व सराहनीय पहल है। इसने अपने मूल्यों, आचारण और समाज को योगदान से संस्कृतियों को ऐसे बदलते समय में साथ लाने का काम किया है, जब क्षेत्रीय भाषाएं पिछड़ती दिख रही हैं। मैं खुश हूं कि इस प्रयास का हिस्सा बन सका। प्रणब ने बृहस्पतिवार शाम नई दिल्ली के तीन मूर्ति सभागार में आयोजित अमर उजाला शब्द सम्मान अलंकरण समारोह-2018 में मुख्य अतिथि के रूप में यह बात कही।

सभ्यताओं को बचाने के लिए शब्दों की पवित्रता जरूरी

‘हम साहित्यिक ‘शब्दों’ को ‘शब्द सम्मान’ प्रदान कर रहे हैं। इन शब्दों ने सदियों से लाखों लोगों के विचारों को अभिव्यक्त किया है। कई बार शक्तियों ने इसे दबाया भी है। सभ्यताओं के अस्तित्व के लिए जरूरी है कि शब्दों की पवित्रता बचाए रखी जाए। इन्हें दबाने के प्रयासों को रोका जाए।’

नामवर व कारनाड को सर्वोच्च सम्मान आकाशदीप

पूर्व राष्ट्रपति ने हिंदी में नामवर सिंह और कन्नड़ के नामी लेखक-रंगकर्मी गिरीश कारनाड को सर्वोच्च सम्मान आकाशदीप प्रदान किया। अस्वस्थता के चलते नामवर के पुत्र विजय सिंह और कारनाड के प्रतिनिध रघु अमय कारनाड ने अलंकरण ग्रहण किए। दोनों शब्दसाधकों को 5-5 लाख रुपये व प्रतीक चिन्ह दिए गए।

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने शब्द सम्मान अलंकरण समारोह में कहा कि ‘अमर उजाला’ ने लोक प्रहरी की भूमिका से आगे बढ़कर शब्द साधकों का सम्मान किया है। यह अनूठी व सराहनीय पहल है। इसने अपने मूल्यों, आचारण और समाज को योगदान से संस्कृतियों को ऐसे बदलते समय में साथ लाने का काम किया है, जब क्षेत्रीय भाषाएं पिछड़ती दिख रही हैं। मैं खुश हूं कि इस प्रयास का हिस्सा बन सका। प्रणब ने बृहस्पतिवार शाम नई दिल्ली के तीन मूर्ति सभागार में आयोजित अमर उजाला शब्द सम्मान अलंकरण समारोह-2018 में मुख्य अतिथि के रूप में यह बात कही।

सभ्यताओं को बचाने के लिए शब्दों की पवित्रता जरूरी

‘हम साहित्यिक ‘शब्दों’ को ‘शब्द सम्मान’ प्रदान कर रहे हैं। इन शब्दों ने सदियों से लाखों लोगों के विचारों को अभिव्यक्त किया है। कई बार शक्तियों ने इसे दबाया भी है। सभ्यताओं के अस्तित्व के लिए जरूरी है कि शब्दों की पवित्रता बचाए रखी जाए। इन्हें दबाने के प्रयासों को रोका जाए।’

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