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जेब पर कितनी भारी पड़ रही है खानपान की एलर्जी

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“मुझे कभी पता ही नहीं चला कि मेरे पेट में हमेशा एक दर्द रहता था।” सुनने में यह अजीब लगता है, लेकिन अगर आपको सीलियक जैसी ऑटो-इम्यून बीमारी हो तो आप जान ही नहीं पाते कि जीने का दूसरा तरीका भी है। 31 साल की उम्र में पिछले साल ब्लड टेस्ट से पता चला कि मुझे सीलियक बीमारी है। पहले मैं जब भी अपनी आंतों पर दबाव डालती थी तो हमेशा एक हल्का दर्द होता था। मैंने कभी ध्यान ही नहीं दिया था कि कई बार मेरा पेट फूल जाता था और उसमें दर्द रहता था। फूड पॉयजनिंग के कारण एक बार मैं 15 दिनों के लिए उठ ही नहीं पाई। तब मेरे पति ने मुझे डॉक्टर से मिलने की सलाह दी।

मुझे पता चला कि जब भी मैं ग्लूटन खाती थी, मेरा इम्यून सिस्टम खुद पर हमले करने लगता था। सीलियक बीमारी गेहूं, जौ और राई में मिलने वाले प्रोटीन (ग्लूटन) के लिए ऑटो-इम्यून प्रतिक्रिया है। ग्लूटन खाने की वजह से इस बीमारी के शिकार लोगों की आंतें क्षतिग्रस्त हो जाती हैं और अगर बीमारी की सही पहचान या इलाज न हो तो यह कैंसर का कारण भी बन सकती है।

ग्लूटन से मुक्त आहार मेरी जरूरत है और मैंने इस बारे में जिससे भी बात की, सबने यही कहा कि अब तो ग्लूटन-फ्री विकल्पों की कोई कमी नहीं है। फूड एलर्जी के बारे में जागरुकता बढ़ने से खाने-पीने के नये विकल्प आ गए हैं। लैक्टोस-फ्री दूध, ग्लूटन-फ्री बीयर और मेवे से मुक्त बिस्कुट से दुकानें भरी हुई हैं। कई दुकानों में तो “फ्री-फ्रॉम” सेक्शन भी बन गए हैं।

ब्रिटेन में पिछले 5 साल में फ्री-फ्रॉम बाजार 133 फीसदी बढ़ा है। 2018 में इसके 83.7 करोड़ पाउंड (101 करोड़ डॉलर) रहने का अनुमान था। यह पॉपुलर कल्चर का भी हिस्सा बन रहा है। ब्रिटेन के मशहूर टीवी शो- “द ग्रेट ब्रिटिश बेक ऑफ़” में ग्लूटन-मुक्त और डेयरी-मुक्त डायट की चुनौतियां दी जा रही हैं। खाने-पीने की एलर्जी को दूर रखने वाले आहार बहुतायत में उपलब्ध हो रहे हैं, लेकिन वे सस्ते नहीं हैं।

ब्रिटेन में ग्लूटन से मुक्त आहार परंपरागत आहार के मुकाबले 159 फीसदी महंगे हैं। किराने का मेरा अपना बिल बढ़ गया है। प्रेट्जेल स्टिक्स की एक थैली के लिए पहले 3 डॉलर लगते थे। उसके ग्लूटन-फ्री विकल्प के लिए अब मुझे 4.50 डॉलर लगते हैं। सैंडविच ब्रेड के लिए पहले मैं 2.50 डॉलर देती थी। अब फ्रोजन ग्लूटन-फ्री ब्रेड के लिए मैं 4.50 डॉलर चुकाती हूं। 0.99 डॉलर का पास्ता भी अब 4.50 डॉलर का हो गया है। यदि मैं घर से बाहर खाना खाने जाऊं तो कीमत के आधार पर विकल्प नहीं चुन सकती। मुझे एक ही ग्लूटन-फ्री विकल्प मिलता है जो 10 डॉलर महंगा भी हो सकता है।
फूड एलर्जी से जुड़े कई और खर्च भी हैं। 2012 में अमरीकी मेडिकल एसोसिएशन के शोधकर्ताओं ने फ़ूड एलर्जी से पीड़ित बच्चों के 1,643 मां-बाप का सर्वे किया था। पता चला कि वे हर बच्चे पर सालाना 4,184 डॉलर अतिरिक्त खर्च कर रहे थे। शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला कि फूड एलर्जी के शिकार अमरीका के करीब 8 फीसदी बच्चों के इलाज पर सालाना लगभग 25 अरब डॉलर का खर्च है। इसमें डॉक्टरों की फीस, अस्पताल के खर्च, दवाइयों और विशेष आहार पर करीब 5.5 अरब डॉलर का खर्च था।

उसी साल फिनलैंड के शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया था कि फूड एलर्जी के शिकार बच्चों पर औसत रूप से 3,182 यूरो (3,600 डॉलर) का अतिरिक्त खर्च है। “फ्री-फ्रॉम” किराने के सामान पर होने वाले खर्च का सही-सही आंकड़ा ढूंढ़ना मुश्किल है। फिर भी खर्च तो हो ही रहा है और इसमें कोई कटौती भी नहीं हो सकती।
आयरलैंड के यूनिवर्सिटी कॉलेज कॉर्क में बचपन के अध्ययन के डिग्री प्रोग्राम की निदेशक आद्रे डनगैल्विन कहती हैं, “ट्रिगर फूड से दूर रहना ही आत्म-प्रबंधन के केंद्र में है।” डनगैल्विन मास्को में आई.एम. सेचनोव स्टेट मेडिकल यूनिवर्सिटी में बाल चिकित्सा और बच्चों की संक्रामक बीमारियों के बारे में पढ़ाती भी हैं। वह कहती हैं, “अनजाने में खा लेना सामान्य है, जिससे कभी-कभी जान पर बन आती है।”

अमरीका के इलिनॉयस प्रांत में 2008 से 2012 के बीच एलर्जी वाले भोजन करने से होने वाली बीमारी एनाफिलैक्सिस के कारण अस्पताल में भर्ती होने वालों की तादाद 30 फीसदी बढ़ी। इसमें सभी नस्ल, जाति और सामाजिक-आर्थिक वर्गों के लोग थे। यूएस सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के मुताबिक 1997 से 2011 के बीच बच्चों में फ़ूड एलर्जी 50 फीसदी बढ़ी है।

अब तक यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि पहले से ज्यादा लोगों को फूड एलर्जी क्यों हो रही है। कई लोगों के लिए विशेष आहार उनकी पसंद का मामला नहीं है, बल्कि जीवन और मृत्यु का मामला है।

इंटरनेशनल फ़ूड इंफॉर्मेशन काउंसिल फाउंडेशन के 2018 के फ़ूड एंड हेल्थ सर्वे में 64 फीसदी उपभोक्ताओं ने कहा ता कि खाने-पीने की चीज खरीदते समय वे कीमत के आधार पर फैसले लेते हैं। फूड एलर्जी से पीड़ित लोग भी कीमत को लेकर अन्य उपभोक्ताओं की तरह ही संवेदनशील होते हैं। फूड इंडस्ट्री की पूर्व विश्लेषक और “द अनहेल्दी ट्रूथ” की लेखक रॉबिन ओ’ब्रायन कहती हैं, “शायद ऐसे लोग कीमत को लेकर ज्यादा संवेदनशील होते हैं, क्योंकि उन्हें दवाइयों पर भी खर्च करना होता है।”

लेकिन फूड एलर्जी वाले लोगों के पास शायद ही कभी कीमत के आधार पर भोजन के विकल्प चुनने की सुविधा होती है। ग्लूटन-मुक्त खाद्य पदार्थों की कीमत के बारे में किए गए अध्ययन में ही पता चला था कि पेट के लिए सेहतमंद अनाज 205 फीसदी तक महंगे थे और ब्रेड और बेकरी उत्पाद 267 फीसदी ज्यादा महंगे थे। डनगैल्विन एक रिसर्च का हवाला देती हैं जो कहता है कि कम आय वाले लोगों के लिए एलर्जी-फ्री भोजन तक पहुंच बहुत कठिन है।

“ऊंची कीमत के कारण ही कामकाजी गरीब मजदूरों, आप्रवासियों, गरीब युवाओं और फूड बैंक में खाना खाने वाले लोगों को एलर्जी-फ्री खाना नसीब नहीं है।” ग्रामीण समुदायों में और सीमित खरीद विकल्पों वाले लोग भी परेशान रहते हैं। ब्रिटिश शोधकर्ताओं ने पाया कि सीलियक बीमारी में फायदेमंद 82 फीसद खाद्य-उत्पाद रेगुलर सुपरमार्केट की तुलना में ऑनलाइन बहुत ज्यादा महंगे थे।

ओ’ब्रायन कहती हैं कि कंज्यूमर पैकेज्ड गुड्स (CPG) के निर्माता विशेष और सामान्य आहारों की कीमत में भारी अंतर के बारे में जानते हैं। इंडस्ट्री की मजबूरियों के बावजूद उनका मानना है कि कीमतें मांग और पूर्ति से निर्धारित होती हैं, जिसका अर्थ है कि दाम के घटने की संभावना है। “बड़ी अंतरराष्ट्रीय सीपीजी कंपनियां, जैसे डैनोन और नैस्ले इस क्षेत्र में उतर रही हैं। नैस्ले हेल्थ साइंस ने माना है कि एलर्जी-फ्री फॉर्मूला उनके लिए सबसे तेज़ी से बढ़ने वाले उत्पादों में शामिल है।”

डनगैल्विन का कहना है कि कुछ अन्य कारक भी कीमत कम कर सकते हैं, जैसे- उत्पादन और परीक्षण के ज़्यादा प्रभावी तरीके और स्पेशल डायट के बारे में उपभोक्ताओं की जागरुकता। खाद्य उत्पादकों, वैज्ञानिकों, उपभोक्ताओं, मरीज समूहों, स्वास्थ्य पेशेवरों और नीति नियामकों को एक जगह लाना भी महत्वपूर्ण है। अभी उनकी प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं।

मैं नहीं कह सकती है मैं फूलगोभी पिज्जा को उतना ही पसंद करती हूं जितना कि कनेक्टिकट में न्यू हैवेन के अपने पसंदीदा पिज्जा रेस्त्रां का पिज्जा मुझे पसंद था।

लेकिन फ्री-फ्रॉम फूड ने एलर्जी से जूझ रहे लाखों लोगों की तरह मुझे भी राहत दी है। अच्छी सेहत, ज्यादा विकल्प, संक्रमण का कम खतरा और और तरक्की की उम्मीद। शायद आर्थिक राहत के लिए अभी लंबा इंतजार करना पड़ेगा।

“मुझे कभी पता ही नहीं चला कि मेरे पेट में हमेशा एक दर्द रहता था।” सुनने में यह अजीब लगता है, लेकिन अगर आपको सीलियक जैसी ऑटो-इम्यून बीमारी हो तो आप जान ही नहीं पाते कि जीने का दूसरा तरीका भी है। 31 साल की उम्र में पिछले साल ब्लड टेस्ट से पता चला कि मुझे सीलियक बीमारी है। पहले मैं जब भी अपनी आंतों पर दबाव डालती थी तो हमेशा एक हल्का दर्द होता था। मैंने कभी ध्यान ही नहीं दिया था कि कई बार मेरा पेट फूल जाता था और उसमें दर्द रहता था। फूड पॉयजनिंग के कारण एक बार मैं 15 दिनों के लिए उठ ही नहीं पाई। तब मेरे पति ने मुझे डॉक्टर से मिलने की सलाह दी।


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