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आतंकी घटनाओं से भरा है श्रीलंकाई इतिहास, तीन दशक रही प्रभाकरन की चुनौती

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21 मई 2009 को लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (एलटीटीई या लिट्टे) के संस्थापक वेलुपिल्लई प्रभाकरण को श्रीलंका की सेना ने मौत के घाट उतार दिया था। इसी के साथ श्रीलंका का जाफना क्षेत्र लिट्टे के आतंक से आजाद हो गया था। प्रभाकरण के मार जाने के बाद लिट्टे ने हार मानते हुए अपनी बंदूकें शांत करने की घोषणा की थी। लेकिन अब एक दशक बाद प्रभाकरण की मौत के दस साल होने के ठीक एक महीने पहले श्रीलंका बम धमाकों से दहल गया है।

श्रीलंकाई मीडिया के अनुसार इन धमाकों में 42 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई है। वहीं 200 से ज्यादा लोग घायल हो गए हैं। देशभर में सेना तैनात कर दी गई है लेकिन अभी तक यह पुष्टि नहीं हो पाई है कि इन धमाकों के पीछे किसका हाथ है।

शुरुआती रिपोर्ट के अनुसार ईस्टर के मौके पर चर्च जाने वाले लोगों को निशाना बनाया गया है। अभी तक श्रीलंका सरकार ने इसे लेकर कोई बयान जारी नहीं किया है। हालांकि इस हमले की वजह से लोगों के जेहन में एक बार फिर लिट्टे का ख्याल जरूर आया होगा। यह भी सच है कि भले ही प्रभाकरण मारा जा चुका है, लेकिन उसके संगठन लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम के समर्थक और कार्यकर्ता आज भी दुनिया के अलग अलग देशों में क्रियाशील हैं।

शनिवार को ही स्विट्जरलैंड की एक अदालत के फैसले के खिलाफ लिट्टे के 13 आर्थिक सहयोगियों ने अपील दायर की थी। इन सभी पर लिट्टे के लिए धन जुटाने का आरोप है। इससे यह तो साबित होता है कि प्रभाकरण का संगठन आज भी जिंदा है। या यूं कहें कि वो पिछले दस साल से चुपचाप खुद को मजबूत कर रहे हों और कुछ बड़ा करने की तैयारी में जुटे हों।

लिट्टे ने आतंकवादियों को दिखाई थी आत्मघाती हमलों की राह

एलटीटीई के उदय की पृष्ठभूमि में सिंहली और तमिलों के बीच का जातीय संघर्ष था। इसकी कहानी शुरू हुई थी 1971 के आसपास। तीन दशक तक एक गंभीर आंदोलन चलाने वाले वेलुपिल्लई प्रभाकरण की निजी जिंदगी किसी अबूझ रहस्य से कम नहीं थी। प्रभाकरण अपने तमिल गढ़ के अंदर एक महान योद्धा की तरह देखा जाता था। श्रीलंका में एक सरकारी अफसर का बेटा प्रभाकरण अपनी स्कूली पढ़ाई बीच में ही छोड़ चुका था। उसने आत्मघाती आतंकवाद को नए मायने दिए।

54 साल के प्रभाकरण की टीम में दुनिया के सबसे खतरनाक खुदकुश हमलावर भी हुआ करते थे और तावीज में साइनाइड के कैप्सूल बांधकर चलने वाले लड़ाके भी। लगभग 37 साल तक श्रीलंका में प्रभाकरण किसी खौफ की तरह छाया रहा। इस दौरान उसने 70 हजार आम लोगों के अलावा भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी भी अपना शिकार बनाया था।

प्रभाकरण ने 1972 में तमिल न्यू टाइगर्स नाम का संगठन शुरू किया जिसमें युवा स्कूली बच्चे शामिल किए गए थे। 1975 में संगठन का नाम बदलकर लिबरेशन टाइगर्स ऑफ़ तमिल ईलम (लिट्टे) रखा गया। उसी साल वेलिकाडे जेल नरसंहार के बाद लिट्टे एक कुख्यात के संगठन के तौर पर सामने आया।

लंबे संघर्ष के दौरान लिट्टे ने कूटनीति के लिए दरवाजे भी खोले लेकिन हर बार रुका हुआ संघर्ष एक नई उत्तेजना और तीव्रता के साथ फिर शुरू हो जाता था। सबसे पहले भारत ने 1985 में थिंफू में लिट्टे के साथ संघर्ष विराम की कोशिश शुरू की और आखिरी बार 2002 में नॉर्वे ने शांति के लिए बीच बचाव किया था। लेकिन 2006 में संघर्ष विराम टूट गया और उसका नतीजा यह अंतिम युद्ध रहा। प्रभाकरण ने एक बार कहा था कि उसे जीते जी कोई नहीं पकड़ सकता।

  • वर्ष 1971 – सीलोन (आज के श्रीलंका) में सिंहली मार्क्सवादी विद्रोह हुआ जिसमें छात्रों और वामपंथी कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया।
  • वर्ष 1972 – सीलोन ने अपना नाम बदलकर श्रीलंका किया और बौद्ध धर्म को देश में प्रमुख स्थान मिला। इससे तमिल संप्रदाय की नाराजगी बढ़ी।
  • वर्ष 1976 – श्रीलंका का उत्तर और पूर्वी हिस्सा तमिल बाहुल्य। वहां तनाव बढ़ता गया। इसी तनाव और विरोध की पृष्ठभूमि में तमिलों के विद्रोही संगठन, लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (एलटीटीई) का गठन हुआ।
  • वर्ष 1977 – पृथकतावादी तमिल यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट (टीयूएलएफ) ने तमिल बाहुल्य क्षेत्रों में सभी सीटें जीतीं।
  • वर्ष 1983 – एलटीटीई के घात लगाकर किए गए हमले में 13 सैनिक मारे गए। इसके बाद तमिल विरोधी दंगे भड़क उठे जिनमें सैकड़ों लोगों की मौत हो गई। श्रीलंका के उत्तरी क्षेत्र में तमिलों और सरकारी सेना के बीच लड़ाई तेज हो गई।

गृहयुद्ध की गंभीरता

  • वर्ष 1985 – सरकार और तमिल विद्रोहियों के बीच शांति वार्ता की पहली कोशिश नाकाम हो गई।
  • वर्ष 1987 – सरकारी सेनाओं ने उत्तरी शहर जाफना में तमिल विद्रोहियों को और पीछे हटा दिया। सरकार ने एक ऐसे समझौते पर दस्तखत किए जिनके तहत तमिल बाहुल्य इलाकों में नई परिषदों का गठन किया जाना था। भारत के साथ भी समझौता हुआ जिसके तहत वहां भारत की शांति सेना की तैनाती हुई।
  • वर्ष 1988 – वामपंथी धड़े और सिंहलों की राष्ट्रवादी पार्टी, जनता विमुक्ति पैरामुना (जेवीपी) ने भारत-श्रीलंका समझौते के खिलाफ अभियान शुरू किया।
  • वर्ष 1990 – उत्तरी क्षेत्र में काफी लड़ाई को देखते हुए भारतीय सेना ने देश छोड़ दिया। श्रीलंका की सेना और पृथकतावादी तमिल विद्रोहियों के बीच हिंसा और बढ़ गई।

राजीव गांधी की हत्या

  • वर्ष 1991 – भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की तमिलनाडु राज्य में एक आत्मघाती हमले में मौत हो जाती है जिसके लिए तमिल विद्रोहियों को जिम्मेदार ठहराया गया।
  • वर्ष 2002 (मार्च-मई) – हथियार छोड़ने की प्रक्रिया शुरू हुई। जाफना को श्रीलंका के बाकी हिस्से से जोड़ने वाली सड़क 12 वर्ष बाद खुली। जाफना के लिए यात्री विमानों की उड़ान भी शुरू हुई।
  • वर्ष 2002 – सितंबर में सरकार ने तमिल विद्रोहियों पर से प्रतिबंध हटा लिया जो उनकी लंबे समय से मांग रही थी। पहले दौर की बातचीत थाईलैंड में शुरू हुई। दोनों पक्षों ने पहली बार युद्ध कैदियों की अदला-बदली की। तमिल विद्रोहियों ने अलग देश की मांग छोड़ दी।
  • वर्ष 2002 – दिसंबर में नॉर्व में हुई शांति वार्ता में दोनों पक्ष सत्ता बंटवारे पर सहमत हुए। इस समझौते के तहत अल्पसंख्यक तमिलों को मुख्य रूप से तमिलभाषी – पूर्वोत्तर क्षेत्रों में स्वायत्तता देने की बात हुई।
  • वर्ष 2003 – फरवरी में शांति वार्ता का अगला दौर बर्लिन में संपन्न हुआ।
  • वर्ष 2003 – अप्रैल में तमिल विद्रोहियों ने शांति वार्ता से यह कहते हुए हाथ खींच लिया कि उन्हें नजरअंदाज किया जा रहा है।

राजनीतिक संकट

  • वर्ष 2003 – नवंबर में राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंगा ने तीन मंत्रियों को बर्खास्त किया और संसद स्थगित कर दी। शांति वार्ता को लेकर सरकार के साथ उनकी अनबन चल रही थी। एक पखवाड़े के बाद संसद बहाल कर दी गई लेकिन तमिल विद्रोहियों के साथ बातचीत स्थगित कर दी गई।
  • वर्ष 2004 – मार्च में विद्रोही तमिल नेता करुणा ने अलग होकर अपना अलग धड़ा बना लिया और अपने समर्थकों के साथ भूमिगत हो गया।
  • वर्ष 2004 – अप्रैल में राजनीतिक खींचतान के बीच समय से पहले आम चुनाव कराए गए। कुमारतुंगा की पार्टी को 225 में 105 सीटें मिलीं जो सरकार बनाने के लिए काफी नहीं थीं। महिंद्रा राजपक्षे को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई गई।
  • वर्ष 2004 – जुलाई – कोलंबो में एक आत्मघाती हमला हुआ जो 2001 के बाद से इस तरह का बड़ा हमला था। इससे शांतिवार्ता के औचित्य पर सवाल खड़े हो गए।
  • वर्ष 2004 – दिसंबर में सुनामी के कहर ने 30 हजार से ज्यादा लोगों की जान ले ली। लाखों लोग बेघर भी हो गए। श्रीलंका में राष्ट्रीय आपदा घोषित की गई।
  • वर्ष 2005 – जून में तमिल बाहुल्य इलाकों में भी सूनामी प्रभावितों तक सहायता पहुंचाने के लिए समझौता हुआ।
  • वर्ष 2005 – अगस्त में विदेश मंत्री लक्ष्मण कादिरगमर की हत्या के बाद राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा की गई।

बिखर गईं कोशिशें

  • वर्ष 2005 – नवंबर में प्रधानमंत्री महिंद्रा राजपक्षे ने राष्ट्रपति पद के लिए हुआ चुनाव जीता। इस चुनाव में तमिल विद्रोहियों के नियंत्रण वाले बहुत से इलाकों में लोगों ने मतदान में हिस्सा ही नहीं लिया।
  • वर्ष 2006 – फरवरी में सरकार और तमिल विद्रोहियों ने जेनेवा में हुई शांति बातचीत में उस युद्धविराम समझौते के लिए अपना सम्मान फिर से व्यक्त किया जो 2002 में हुआ था।
  • वर्ष 2006 – अप्रैल में पूर्वोत्तर में तमिल बाहुल्य शहर ट्रिंकोमाली में विस्फोट हुए जिनके बाद दंगे भी फैले जिनमें 16 लोगों की मौत हो गई। पुलिस ने उन विस्फोटों के लिए तमिल विद्रोहियों को जिम्मेदार ठहराया। कोलंबो में मुख्य सैन्य परिसर में एक आत्मघाती हमला हुआ जिसमें आठ लोग मारे गए। श्रीलंका की सेना ने उसके बाद तमिल विद्रोहियों के ठिकानों को निशाना बनाते हुए हवाई हमले किए।
  • वर्ष 2007- श्रीलंका की पुलिस ने सैकड़ों की तादाद में तमिल नागरिकों को राजधानी कोलंबो से बाहर निकाल दिया। इसके पीछे सुरक्षा चिंताओं का हवाला दिया गया। हालांकि न्यायालय ने इसे ग़लत करार दिया।

अंत की शुरुआत

  • वर्ष 2008 – श्रीलंका सरकार ने 2002 के शांति समझौते को बेमानी बताते हुए इससे अपने हाथ खींच लिए।
  • वर्ष 2008 – मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों से घिरी श्रीलंका सरकार। अंतरराष्ट्रीय पैनलों ने भी भर्त्सना की।
  • वर्ष 2008 – जुलाई में सरकार ने दावा किया कि उन्होंने तमिल विद्रोहियों के देश के उत्तर में स्थित नौसेना बेस पर कब्जा कर लिया है। इसी वर्ष अक्टूबर में हुए आत्मघाती हमलों में एक पूर्व जनरल समेत 27 लोग मारे गए। इसका भी आरोप एलटीटीई पर लगा। यहां से खुली लड़ाई की बात शुरू हो गई। श्रीलंका की सेना और एलटीटीई की ओर से एक दूसरे के लोगों को मारने की दावेदारियां शुरू हो गईं।
  • वर्ष 2009 – जनवरी में 10 वर्षों से एलटीटीई के कब्जे में रहे किलिनोच्चि शहर पर अपना कब्जा कर लिया। यह शहर एलटीटीई का प्रशासनिक मुख्यालय था। राष्ट्रपति ने तमिल विर्दोहियों से समर्पण करने को कहा।
  • वर्ष 2009 – फरवरी में दुनियाभर से श्रीलंका में मानवाधिकार उल्लंघन को लेकर चिंता व्यक्त की जाने लगी। युद्धक्षेत्र में फंसे हजारों-लाखों लोगों को लेकर विश्व समुदाय ने मांग की कि अल्पकालिक संघर्षविराम घोषित हो। श्रीलंका की सरकार ने इस मांग को खारिज कर दिया। तमिल विद्रोहियों को फिर से समर्पण करने को कहा। पर एलटीटीई ने कोलंबो पर हवाई हमले किए।
  • वर्ष 2009 मार्च – एलटीटीई से अलग हुए विद्रोही नेता करुणा को मंत्रिमंडल में जगह मिली। एलटीटीई के एक वरिष्ठ नेता थामिलेंथी मारे गए। संयुक्त राष्ट्र ने दोनों पक्षों की युद्ध अपराधों के लिए भर्त्सना की। अप्रैल और मई में सेना का अभियान अपने चरम पर पहुंच गया। एलटीटीई का दायरा लगातार घटता गया। एक छोटे से इलाके में सिमटे तमिल विद्रोहियों के बीच फंसे हजारों लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने का मुद्दा उठता रहा। हजारों लोग खुद युद्ध क्षेत्र में भागकर बाहर आए। सैकड़ों मारे गए। तमिल विद्रोहियों ने दो बार संघर्ष विराम घोषित किया पर सेना का अभियान जारी रहा।
  • मई, 2009 को प्रभाकरन की मौत की खबर के साथ एलटीटीई के अस्तित्व का अंत मान लिया गया।
21 मई 2009 को लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (एलटीटीई या लिट्टे) के संस्थापक वेलुपिल्लई प्रभाकरण को श्रीलंका की सेना ने मौत के घाट उतार दिया था। इसी के साथ श्रीलंका का जाफना क्षेत्र लिट्टे के आतंक से आजाद हो गया था। प्रभाकरण के मार जाने के बाद लिट्टे ने हार मानते हुए अपनी बंदूकें शांत करने की घोषणा की थी। लेकिन अब एक दशक बाद प्रभाकरण की मौत के दस साल होने के ठीक एक महीने पहले श्रीलंका बम धमाकों से दहल गया है।

श्रीलंकाई मीडिया के अनुसार इन धमाकों में 42 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई है। वहीं 200 से ज्यादा लोग घायल हो गए हैं। देशभर में सेना तैनात कर दी गई है लेकिन अभी तक यह पुष्टि नहीं हो पाई है कि इन धमाकों के पीछे किसका हाथ है।

शुरुआती रिपोर्ट के अनुसार ईस्टर के मौके पर चर्च जाने वाले लोगों को निशाना बनाया गया है। अभी तक श्रीलंका सरकार ने इसे लेकर कोई बयान जारी नहीं किया है। हालांकि इस हमले की वजह से लोगों के जेहन में एक बार फिर लिट्टे का ख्याल जरूर आया होगा। यह भी सच है कि भले ही प्रभाकरण मारा जा चुका है, लेकिन उसके संगठन लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम के समर्थक और कार्यकर्ता आज भी दुनिया के अलग अलग देशों में क्रियाशील हैं।

शनिवार को ही स्विट्जरलैंड की एक अदालत के फैसले के खिलाफ लिट्टे के 13 आर्थिक सहयोगियों ने अपील दायर की थी। इन सभी पर लिट्टे के लिए धन जुटाने का आरोप है। इससे यह तो साबित होता है कि प्रभाकरण का संगठन आज भी जिंदा है। या यूं कहें कि वो पिछले दस साल से चुपचाप खुद को मजबूत कर रहे हों और कुछ बड़ा करने की तैयारी में जुटे हों।

लिट्टे ने आतंकवादियों को दिखाई थी आत्मघाती हमलों की राह

एलटीटीई के उदय की पृष्ठभूमि में सिंहली और तमिलों के बीच का जातीय संघर्ष था। इसकी कहानी शुरू हुई थी 1971 के आसपास। तीन दशक तक एक गंभीर आंदोलन चलाने वाले वेलुपिल्लई प्रभाकरण की निजी जिंदगी किसी अबूझ रहस्य से कम नहीं थी। प्रभाकरण अपने तमिल गढ़ के अंदर एक महान योद्धा की तरह देखा जाता था। श्रीलंका में एक सरकारी अफसर का बेटा प्रभाकरण अपनी स्कूली पढ़ाई बीच में ही छोड़ चुका था। उसने आत्मघाती आतंकवाद को नए मायने दिए।

54 साल के प्रभाकरण की टीम में दुनिया के सबसे खतरनाक खुदकुश हमलावर भी हुआ करते थे और तावीज में साइनाइड के कैप्सूल बांधकर चलने वाले लड़ाके भी। लगभग 37 साल तक श्रीलंका में प्रभाकरण किसी खौफ की तरह छाया रहा। इस दौरान उसने 70 हजार आम लोगों के अलावा भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी भी अपना शिकार बनाया था।

प्रभाकरण ने 1972 में तमिल न्यू टाइगर्स नाम का संगठन शुरू किया जिसमें युवा स्कूली बच्चे शामिल किए गए थे। 1975 में संगठन का नाम बदलकर लिबरेशन टाइगर्स ऑफ़ तमिल ईलम (लिट्टे) रखा गया। उसी साल वेलिकाडे जेल नरसंहार के बाद लिट्टे एक कुख्यात के संगठन के तौर पर सामने आया।

लंबे संघर्ष के दौरान लिट्टे ने कूटनीति के लिए दरवाजे भी खोले लेकिन हर बार रुका हुआ संघर्ष एक नई उत्तेजना और तीव्रता के साथ फिर शुरू हो जाता था। सबसे पहले भारत ने 1985 में थिंफू में लिट्टे के साथ संघर्ष विराम की कोशिश शुरू की और आखिरी बार 2002 में नॉर्वे ने शांति के लिए बीच बचाव किया था। लेकिन 2006 में संघर्ष विराम टूट गया और उसका नतीजा यह अंतिम युद्ध रहा। प्रभाकरण ने एक बार कहा था कि उसे जीते जी कोई नहीं पकड़ सकता।

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